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हजारों वर्षों के बाद भारत में एक और आदिवासी चर्चा में, द्रौपदी मुर्मू है उनका नाम

नई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पुरानी परंपरा का वहन करेंगी या वह दो प्रमुख राष्ट्रपतियों के समान कुछ कर गुजरने का माद्दा रखेंगी। भारत के दो प्रमुख राष्ट्रपतियों डॉ. राजेंद्र प्रसाद व दूसरे डॉ. एस राधाकृष्णन को आज भी उनके कार्यों के लिए याद किया जाता है। तो क्या मुर्मू भी लीक से हटकर चल सकती हैं?

जंबूद्वीप (भारत) में हजारों वर्ष से विशेष घटनाक्रम को लेकर एक किशोर आदिवासी की चर्चा होती है। देश के प्राचीन महाकाव्य ‘महाभारत’ के इस आदिवासी पात्र की ‘गुरु दक्षिणा’ को आज भी सराहा जाता है। अब भारत में एक और आदिवासी वह भी महिला चर्चा में है। गजब संयोग है कि यह महिला भी भारत के इसी महाकाव्य की एक पात्र है, लेकिन संदर्भ बदल गया है। इनका नाम है द्रौपदी मुर्मू और वह विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में सबसे बड़े राष्ट्रपति पद के लिए चुन ली गई हैं। वह 25 जुलाई को इस पद की शपथ लेंगी।

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर गत 18 जुलाई को पूरे देशभर के सांसदों और विधायकों ने वोटिंग की थी। आज गुरुवार को हुई गिनती में सत्तारूढ़ एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू ने विपक्ष के प्रत्याशी यशवंत सिन्हों को बड़ी ही आसानी से बड़े मतों के अंतर से पराजित कर दिया।

महाभारत के जिस किशोर आदिवासी (भील) की बात की जा रही है, उसका नाम एकलव्य था। यह किशोर धनुर्विद्या में खासा निपुण था। उसमें और धार देने के लिए वह पांडवों के गुरु द्रोणाचार्य से इस विद्या की शिक्षा लेने के लिए आया, लेकिन उसकी तीरंदाजी देखकर गुरुजी को भान हो गया कि यह किशोर इस विद्या में अर्जुन से आगे निकल जाएगा, जिससे भविष्य के समीकरण गड़बड़ा जाएंगे। उन्होंने एकलव्य को शिक्षा देने के लिए गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया। उसने सहर्ष दे दिया और उसके बाद इस विद्या में उसका भविष्य खत्म हो गया। इस आदिवासी किशोर की दक्षिणा को विभिन्न प्रसंगों, उदाहरणों में आज भी याद किया जाता है। अब एक और आदिवासी (महिला) को याद किया जा रहा है और उसके संघर्ष, जिजिविषा और राजनैतिक मेहनत को भी (दूसरे संदर्भों में) सराहा जा रहा है।

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर गत 18 जुलाई को पूरे देशभर के सांसदों और विधायकों ने वोटिंग की थी। आज गुरुवार को हुई गिनती में सत्तारूढ़ एनडीए की प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू ने विपक्ष के प्रत्याशी यशवंत सिन्हों को बड़ी ही आसानी से बड़े मतों के अंतर से पराजित कर दिया। मुर्मू आजाद भारत की 15वीं राष्ट्रपति हैं और देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति। लेकिन इस पद को महिला और वह भी आदिवासी पहली बार सुशोभित कर रही है। भारतीय संविधान के अनुसार राष्ट्रपति देश का तो मुखिया होता ही है, साथ ही वह तीनों सेनाओं का प्रमुख और विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का भी प्रमुख होता है। देखने में यह अधिकार खासे प्रभावी लगते हैं परंतु भारत का यह सर्वोच्च पद खासा किंतु-परंतु में उलझा हुआ है और मोटे तौर पर इसे एक ‘सजावटी पद’ माना जाता है, जिसके पास सुविधाओं का ’खजाना’ होता है।

आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने सरकार को सीधे निर्देश भी जारी किए और झारखंड के विश्वविद्यालयों के लिए चांसलर पोर्टल शुरू कराया।

तो क्या नई राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी इसी परंपरा का वहन करेंगी या वह देश के दो प्रमुख राष्ट्रपतियों के समान कुछ कर गुजरने का माद्दा रखेंगी। भारत के दो प्रमुख राष्ट्रपतियों पहले डॉ. राजेंद्र प्रसाद व दूसरे डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को आज भी उनके कार्यों के लिए याद किया जाता है। डॉ. प्रसाद ने भारतीय संविधान के निर्माण में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राष्ट्रपति से पहले उन्होंने भारत के पहले मंत्रिमंडल 1946 व 1947 में कृषि और खाद्यमंत्री का दायित्व भी निभाया था। यह वह दौर था जब देश की सरकार राष्ट्रपति का सम्मान करती थी और उनके निर्णयों पर अमल करने में विश्वास करती थी। उन्होंने विश्व में भारत की छवि निखारने के लिए कई देशों का दौरा किया। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े डॉ. प्रसाद को देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी नवाजा गया है।

दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को देश का प्रभावी शिक्षाविद माना जाता है और उनके जन्मदिवस (5 सितम्बर) को सर्व सर्वसम्मति से हर वर्ष शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनका कार्यकाल काफी चुनौतीपूर्ण रहा। क्योंकि उसी दौरान भारत को पाकिस्तान व चीन के युद्धों से दो-चार होना पड़ा। जहां चीन के समक्ष देश को हार का मुंह देखना पड़ा। साथ ही देश के दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इसी दौरान हुआ। इसके बावजूद उन्होंने भारत की गरिमा को आगे बढ़ाने में महती कार्य किए। इसके बाद राष्ट्रपतियों का कार्यकाल बहुत उल्लेखनीय नहीं माना जाता है। बाद में सही मायनों में देश के यह मुखिया का पद ‘सजावटी’ मान लिया गया। अब बड़ा प्रश्न यह है कि देश के सर्वोच्च पद पर पहुंची आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू क्या ऐसा कुछ कर गुजरेंगी, जिससे भारत के इतिहास में हमेशा के लिए उनका नाम लिया जाता रहे।

इस सवाल का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा है। कठिनाई तो है ही, क्योंकि भारतीय संविधान में ही राष्ट्रपति को प्रभावी अधिकार नहीं मिले हैं, ऐसे में क्या माना जा सकता है कि मुर्मू लीक से हटकर चलेंगी। अगर उनके राजनैतिक कार्यकाल को देखें तो झारखंड का राज्यपाल बनने से पहले उन्होंने काफी संघर्ष किया, क्लर्क, शिक्षक, सरपंच, विधायक से लेकर राज्य का मंत्री पद भी संभाला। वर्ष 2015 में वह राज्यपाल बनी थीं। उनका राज्यपाल का कार्यकाल ‘सजावटी’ नहीं माना जाता। इस दौरान उन्होंने राज्य सरकार के कई विधेयकों को लौटाने का साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने भाजपा की रघुवर दास सरकार में सीएनटी-एसपीटी संशोधन विधेयक को लौटा दिया और हेमंत सोरेन की सरकार में भी कई आपत्तियों के साथ जनजातीय परामर्शसमिति के गठन से जुड़ी फाइल लौटा दी। वह आदिवासियों, बालिकाओं के हितों को लेकर सजग रहीं। आदिवासियों से जुड़े मुद्दों पर उन्होंने सरकार को सीधे निर्देश भी जारी किए और झारखंड के विश्वविद्यालयों के लिए चांसलर पोर्टल शुरू कराया।

फिलहाल मुर्मू के सामने खुला आसमान है और चुनौतियां असीमित। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को चूंकि जबर्दस्त विश्वासमत हासिल है और विपक्ष उसके आगे बेबस है, इसलिए विरोधियों को सरकार की कार्यप्रणाली में कई मीन-मेख नजर आते हैं। आरोप यह भी लगते हैं कि यह सरकार किसी भी नही सुनती और छिपे एजेंडे को बड़े की रणनीतिक तरीके से लागू करने में लगी हुई है। विरोधाभास यह है कि देश में सरकार पर लगातार कई सवाल खड़े होते रहे हैं, लेकिन विश्व में उसने भारत की छवि को अलग ही रूप प्रदान किया है। तो, मुर्मू क्या कर पाएंगी? वह सरकार से उन सवालों के जवाब मांगेगी, जो विपक्ष या देश के सौहार्द वाले चरित्र को कथित तौर पर व्यथित कर रहे हैं। बड़ा हिम्मत का काम है। फिलहाल द्रौपदी मूर्मू को देश का राष्ट्रपति बनने पर शुभकामनाएं।

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