चिदंबरम मंदिर: आध्यात्म ही नहीं, मानव विज्ञान से भी है इसका गहरा नाता

मंदिर के गर्भगृह की छत यानी विमानम पर 21600 सोने की परत चढ़ाई गई है और आपको पता होगा कि यह संख्या उतनी है जितनी बार इंसान एक दिन में सांस लेता और छोड़ता है। इन परतों को 72000 सोने की कील के सहारे लगाया गया है ये कील इंसान की नाड़ी की संख्या के बराबर हैं।

चिदंबरम मंदिर: आध्यात्म ही नहीं, मानव विज्ञान से भी है इसका गहरा नाता
तमिलनाडु के कुडलुर में बसा चिदंबरम मंदिर

धार्मिक ग्रंथों के एक महानायक भगवान शिव सर्वदा भारत के कण-कण में अपने अद्भुत स्वरूप लिए हुए हैं। शिव  की कल्पना आपके मानस पटल पर एक ऐसे देवता की छवि उकेरती है जो संसार की मोह-माया से परे है। उन्हें मखमली पोशाक नहीं मृगछाल पसंद हैं, सोने की जगह उन्हें सांपों की माला भाती है और वह किसी शेर और गरुड़ पर नहीं बल्कि बैल की सवारी कर खुश हैं। शिव का यह रूप उन्हें अहंकार मुक्त योगी बनाता है जो उनके भक्तों को पसंद हैं वहीं शिव का एक और रूप है वह है आनंद तांडव करने वाले नटराज का। यूं तो पूरे भारत में शिव लिंग की पूजा होती है लेकिन दक्षिण भारत में कई स्थानों में उनके नटराज रूप को पूजा जाता है। हम आपको इस लेख के माध्यम से शिव के एक ऐसी धार्मिक स्थली की यात्रा पर ले जाएंगे जो न केवल कला और आध्यात्म बल्कि मानव विज्ञान का सार समझाता है।

मंदिर का स्वर्ण धातु से बना सभागार।

हम बात कर रहे हैं दक्षिण भारत राज्य तमिलनाडु के चिदंबरम मंदिर जो कि थिल्लई नटराज मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में चोल वंश के दौरान हुआ था जो भगवान नटराज को अपना कुल देवता मानते थे।

मानव शरीर के अस्तित्व का सार

मानव शरीर की बारीकियां आपने विज्ञान की किताब में पढ़ी होगी और शायद ही आपने कभी सोचा हो कि किसी धार्मिक स्थल में मानव विज्ञान की झलक देखने को मिलेगी। यह मंदिर पंचभूत - जल, अग्नि, वायु, धरती और आकाश में से आकाश का  प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर पर 14वीं शताब्दी के बाद विदेश आक्रमणकारियों के हमले हुए लेकिन यह अपने स्थान पर मजबूती से खड़ा है तो इसका श्रेय इसकी बेजोड़ स्थापत्य कला को जाता है। मंदिर के स्थापत्य की बात करें तो इसे मानव के हृदय, श्वांस, नाड़ी की पूरी गणना करते हुए तैयार किया गया है। मंदिर के नौ प्रवेश द्वार हैं जिसे गोपुरम कहा जाता है। यह संख्या मनुष्य के शरीर प्रवेश द्वार की संख्या के बराबर है।

मंदिर के गर्भगृह की छत यानी विमानम पर  21600 सोने की परत चढ़ाई गई है और आपको पता होगा कि यह संख्या उतनी है जितनी बार इंसान एक दिन में सांस लेता और छोड़ता है।  इन परतों को  72000 सोने की कील के सहारे लगाया गया है ये कील इंसान की नाड़ी की संख्या के बराबर हैं। मंदिर की आकर्षण का केंद्र गोल्डन हॉल जिसे तमिल में पूनमबलम कहा जाता है। यह बाईं ओर झुका हुआ है। कहा जाता है कि यह हृदय की ओर इशारा करता है। हॉल 28 स्तंभों के सहारे खड़ा किया गया है जो शिव की 28 पूजा पद्धतियों और इंसान के 28 अहम को दर्शाते हैं।

मंदिर में पांच सभागार (हॉल) हैं जिन्हें कनक सभा, चित्त सभा, नृत्त सभा, देव और राज सभा कहा जाता है। नटराज का गर्भगृह चित्तसभा में है। आपको बता दें कि गर्भगृह में नटराज की प्रतिमा नहीं है बल्कि यहां सोने के 51 बेलपत्रों से बने हार की पूजी की जाती है। वैसे मंदिर में आपको अन्य स्थानों पर नटराज की प्रतिमा के दर्शन हो जाएंगे। इस स्थान को हमेशा लाल कपड़े से ढंक कर रखा जाता है और केवल पूजा के वक्त उतारा जाता है। चोल वंश के दौर में नटराज की कांसे की भव्य प्रतिमा बनाई गई थी जिसे दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा गया है।

मंदिर के नौ प्रवेश द्वार हैं

मंदिर की एक और विशेषता दीवारों पर नक्काशी कर लगाई गई सैंकड़ों प्रतिमाएं हैं। ये कोई आम मूर्तियां नहीं बल्कि इनके भी खास अर्थ हैं। ये मूर्तियां भरत मुनि के नाट्यशास्त्र की 108 कारण व गति पर आधारित है जो कि भरतनाट्यम नृत्य शैली का आधार माना जाता है।

क्या कहता है फिजिक्स

यह मंदिर कुडलूर जिला में स्थित है। जिला की आधिकारिक वेबसाइट से मिली जानकारी के अनुसार, तमिल विद्वान तिरुमूलर ने पांच हजार वर्ष पहले ही यह साबित कर दिया था कि यह मंदिर दुनिया के चुंबकीय भूमध्य रेखा यानी मैग्नेटिक इक्वेटर के केंद्र में है। हालांकि पश्चिम वैज्ञानिकों को इसे सत्य मानने में कई साल लग गए और जब उन्हें इस सच्चाई का अहसास हुआ तो नटराज के नृत्य को ब्रह्मांड का नृत्य करार दिया।

नाट्यशास्त्र पर आधारित है मूर्तियां

एक और अनोखा तथ्य यह सामने आया है कि पंचभूत के तीन मंदिर कालाहस्ती (वायु), कांची एकाम्बरेश्वर (धरती) और चिदंबरम 79 डिग्री 42 मिनट के अक्षांश पर एक सीध में खड़े हैं।

कैसे जाएं, कहां ठहरें

क्या आप भी आध्यात्म के इस अद्भुत सफर पर निकलना चाहते हैं तो आपको मंदिर जाने वाले रास्तों की समझ होनी चाहिए। आपके लिए चेन्नई नैशनल एयरपोर्ट सबसे अच्छा विकल्प है। यहां से कुडलूर की दूरी  250 किलोमीटर है जिसके लिए एयरपोर्ट पर कैब मिल जाएगी। दूसरा रास्ता रेल से होकर गुजरता है। कुडलूर, चेन्नई-त्रिची रेल रूट पर मौजूद है तो चेन्नई से रेलगाड़ी ली जा सकती है । दूसरा रेल रूट चेन्नई-वृद्धाचलम का है। आप वृद्धाचलम रेलवे स्टेशन पर उतरकर कुडलूर के लिए कैब ले सकते हैं। वृद्धाचलम और कुडलूर की दूरी 50 किलोमीटर है।

यहां ठहरने के लिए आप ओटीए से होटल बुक कर सकते हैं जो मंदिर के आसपास सस्ती दरों पर कमरे उपलब्ध कराते हैं या आप चाहें तो कुडलूर जिला की वेबसाइट पर जाकर भी होटल बुक कर सकते हैं। जिला प्रशासन ने उन होटलों के नाम और पता, फोन नंबर अपने वेबसाइट पर उपलब्ध कराई है जहां ठहरा जा सकता है।