दक्षिण भारत के ये चार मंदिर, जिनकी वास्तुकला का दुनिया में कोई जोड़ नहीं

दक्षिण भारत की विरासत अनोखी और विश्व विख्यात है। इसके प्राचीन मंदिर हमें इतिहास की वैभवता का अहसास कराते हैं। ये विभिन्न साम्राज्यों के शासनकाल के बारे में समझाते हैं, उनकी वास्तुकला की प्रकृति के बारे में बताते हैं।

दक्षिण भारत के ये चार मंदिर, जिनकी वास्तुकला का दुनिया में कोई जोड़ नहीं

भारत कई तरह की कलाओं का उत्पत्ति स्थल, आश्रयदाता और पालक रहा है। कितनी ही कलाएं यहां फली-फूलीं। इसके उदाहरण आज भी वहां के विभिन्न हिस्सों में देखने को मिल जाते हैं। इतिहास के विभिन्न खंडों में वहां वास्तुकला पर भी खूब काम हुआ। कितने ही मंदिर प्राचीन वास्तुकला के उदाहरण समेटे हुए हैं। इनमें भी दक्षिण भारत के मंदिर अलग ही वैभव से पूर्ण हैं।

दक्षिण भारत की विरासत अनोखी और विश्व विख्यात है। इसके प्राचीन मंदिर इतिहास की वैभवता का अहसास कराते हैं। ये विभिन्न साम्राज्यों के शासनकाल के बारे में समझाते हैं, उनकी वास्तुकला की प्रकृति के बारे में बताते हैं। इस रिपोर्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं दक्षिण भारत के उन चार प्राचीन मंदिरों के बारे में जो अपनी वास्तुकला के लिए दुनियाभर में प्रख्यात हैं।

तमिलनाडु का एकंबरेश्वर मंदिर

Photo : Tamilnadutourism.com

एकंबरेश्वर मंदिर तमिलनाडु के कांचीपुरम का सबसे विशाल और भव्य मंदिर है। भगवान शिव के इस मंदिर में उनकी पूजा पृथ्वी के रूप में की जाती है। यह मंदिर हजारों साल पुराना है, परंतु माना जाता है कि पल्लव वंश, पांड्या वंश, चोल वंश के राजाओं ने इस मंदिर में पुनर्निर्माण कराया। विजयनगर के राजा कृष्णदेव राय ने इस मंदिर में कई संरचनात्मक योगदान दिए थे। कृष्णरायदेव ने 1509 से 1529 ईस्वी तक शासन किया था। वह तुलुवा वंश के तीसरे शासक थे। मंदिर के गर्भगृह के सामने हजार स्तंभों वाला अनूठा हॉल 'ऐयाराम काल मंडपम' है। इसमें 1008 शिवलिंगम की मूर्तियां हैं। माना जाता है कि इसे राजा कृष्णदेव राय ने ही बनवाया था। मंदिर परिसर में मंडप युक्त एक तालाब भी है, जिसे शिव गंगा तीर्थम कहते हैं। इस सरोवर के मध्य में भगवान शिव के पुत्र भगवान गणेश की एक मूर्ति भी स्थापित है।

तमिलनाडु का ऐरावतेश्वर मंदिर

Photo : Tamilnadutourism.com

ऐरावतेश्वर मंदिर द्रविड़ वास्तुकला का एक हिंदू मंदिर है जो तमिलनाडु में कुंभकोणम के पास दारासुरम में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 12वीं सदी में राजराजा चोल द्वितीय ने करवाया था। इसे यूनेस्को ने वैश्विक धरोहर स्थलों में शामिल किया है। यह मंदिर भी भगवान शिव को समर्पित है, लेकिन इसमें एक रथनुमा संरचना है जिसमें कई देवताओं को दिखाया गया है। यह मंदिर कला और स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना है। यहां पत्थरों पर शानदार नक्काशी देखने को मिलती है। इस मंदिर का स्तंभ 80 फीट ऊंचा है। सामने के मंडपम का दक्षिणी भाग पत्थर के बड़े पहियों वाले एक विशाल रथ के रूप में है जिसे घोड़े खींच रहे हैं। मंदिर के पास एक विशाल पत्थर की शिला है जिस पर सप्तमाताओं (सात आकाशीय देवियां) की आकृतियां बनी हैं।