प्यार की ऐसी परिभाषा नीरज ही दे सकते हैं, फिल्मों में मन तो रमा लेकिन वहां प्रवासी ही बने रहे

पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित गोपाल दास नीरज के कई गीत लोग आज भी गुनगुनाते हुए दिख जाते हैं। देवानंद की फिल्म ‘प्रेम-पुजारी’ और ‘गैंबलर’ के गीत तो आज भी सबकी जुबां पर हैं, ऐसे ही राजकपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ आज भी संगीत प्रेमियों के बीच अपनी जगह बनाए हुए है।

प्यार की ऐसी परिभाषा नीरज ही दे सकते हैं, फिल्मों में मन तो रमा लेकिन वहां प्रवासी ही बने रहे
गोपाल दास नीरज, बस नाम ही काफी है।

गोपाल दास नीरज, बस नाम ही काफी है। मंचों के लोकप्रिय कवि जो शिक्षक और साहित्यकार तो थे। लेकिन उन्होंने नाम कमाया फिल्मों से। ऐसे-ऐसे लोकप्रिय गीत लिखे, जिसे पुरानी और नई पीढ़ी आज भी गुनगुनाती है। लेकिन जमीन से जुड़ा यह गीतकार मायानगरी मुंबई में प्रवासी जैसा ही रहा। मौका मिला तो अपनी ‘माटी’ की ओर लौट आया। साहित्य की सैकड़ों किताबें पढ़ लीजिए, गानों के हजारों पन्ने पलट डालिए, लेकिन प्यार (प्रेम) की जो परिभाषा नीरज ने दी है, वह कहीं नहीं मिलेगी। नीरज कहते हैं:-

"शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब

उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब

होगा यूं नशा जो तैयार, वो प्यार है।"

महान गीतकार नीरज की 19 जुलाई को पुण्यतिथि थी। अनंत गगन में चले जाने के बावजूद वह आज भी दिलवालों की जुबान पर हैं। नीरज ने जब तक मंच पर कविता का सस्वर पाठ किया, लोग झूमते रहे। आपको बता दें कि मंचों पर गाते वक्त वह अक्सर मदिरा का सेवन करते थे। यह शराब उनके लिए ऊर्जा का काम करती। मंच के पीछे उनके खास चाहने वाले शराब की बोतल लिए उन्हें पीने के लिए इसरार करते रहते, अपनों के साथ वह जाम छलकाते और फिर मन से कविता पाठ में लग जाते।

भविष्य में कुछ बनना है तो खूब पढ़ो, विश्वास पैदा होगा और यही विश्वास तुम्हें आगे बढ़ाएगा। - गोपाल दास नीरज (फोटो : Twitter @YogendraaPratap)