भगवान शिव की अर्धांग्नि सती के गिरे थे नयन जहां, बन गया 'नैना धाम' वहां

नैना देवी मंदिर शिवालिक पर्वत श्रेणी में बसा एक भव्य मंदिर है। यह मंदिर समुद्र तल से 1177 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर संरचना की अगर बात करें तो प्रवेश करते ही आपको एक पीपल का पेड़ नजर आएगा, जिसके बारे में मान्यता है कि यह सदियों पुराना है। मंदिर के दाईं ओर भगवान गणेश और हनुमान की प्रतिमा है।

भगवान शिव की अर्धांग्नि सती के गिरे थे नयन जहां, बन गया 'नैना धाम' वहां
नैना देवी मंदिर

शिवालिक की सुरम्य पर्वत श्रृंखला में बसा एक अद्भुत तीर्थस्थल, जिसके बारे में कहा जाता है कि महादेव शिव की पत्नी सती से उसका गहरा नाता है। सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देश भारत दुनिया भर में सैलानियों के बीच धार्मिक पर्यटन के लिए भी मशहूर है। भारत की धरती पर कदम रखने वाले श्रद्धालु समुद्र से 1100 मीटर ऊपर स्थित इस पवित्र स्थल का दर्शन जरूर करते हैं। यह मंदिर देवी दुर्गा के 51 शक्तिपीठों में से एक श्री नैना देवी मंदिर है।

जिस तरह हिंदू धर्म में शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग की महत्ता है, ठीक वैसे ही शक्ति के उपासकों के बीच मां दुर्गा के 51 शक्तिपीठों का महत्व है। हिमाचल के बिलासपुर जिला स्थित इस शक्तिपीठ में हर वर्ष चैत्र और आश्विन नवरात्र पर विशेष पूजा होती है जिस दौरान दिनभर हजारों श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता होती है। अगर भारत दर्शन पर आप भी इस शक्तिपीठ के चरणों में मत्था टेकना चाहते हैं तो जरूर पढ़ें पूरा लेख।

मंदिर के आसपास का सुरम्य नजारा 

नैना देवी का इतिहास, मान्यता
नैना देवी जैसा कि नाम से जाहिर होता है कि यह नाम देवी के नयन से जुड़ा है। ऐसी किवंदतियां है कि जब शोक और गुस्से में शिव अपनी पत्नी सती का जला हुआ शव कंधे पर लिए तांडव कर रहे थे तो समूचे ब्रह्मांड में हाहाकार मच गया। इस संकट को दूर करने के लिए देवताओं ने विष्णु की शरण ली और उनके अनुरोध पर विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाकर देवी के शव को 51 भागों में बांट दिया। माना जाता है कि देवी के अंग 51 अलग-अलग स्थानों पर गिरे जिन्हें बाद में शक्तिपीठ के रूप में जाना गया। हिमाचल के बिलासपुर जिले में देवी की आंखें गिरी थीं इसलिए इस शक्तिपीठ का नाम नैना देवी पड़ा।

मंदिर को लेकर एक अन्य कथा भी मशहूर है। नैना देवी मंदिर की वेबसाइट से मिली जानकारी के अनुसार कई वर्षों पहले नैना नाम का एक गुज्जर लड़का उस इलाके में रहता था। एक दिन जब वह मवेशी चरा रहा था तभी उसकी नजर एक गाय पर पड़ी जो कि एक पत्थर पर अपने थन से दूध गिरा रही थी। उसने गाय को ऐसा कई दिनों तक करते हुए देखा। एक रात जब वह सोया था तो देवी उसके सपने में आईं और उससे कहा कि वह पत्थर उनकी पिंडी है। नैना ने सपने की बात राजा बीर चंद को सुनाई। जब राजा ने भी गाय को वैसा ही करते देखा तो नैना के सपने पर भरोसा करते हुए वहां मंदिर का निर्माण कराया जिसका नाम नैना पर रखा गया।

मंदिर का मुख्य प्रांगण

कैसी है मंदिर की संरचना ?

नैना देवी मंदिर शिवालिक पर्वत श्रेणी में बसा एक भव्य मंदिर है। यह मंदिर समुद्र तल से 1177 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। मंदिर संरचना की अगर बात करें तो प्रवेश करते ही आपको एक पीपल का पेड़ नजर आएगा, जिसके बारे में मान्यता है कि यह सदियों पुराना है। मंदिर के दाईं ओर भगवान गणेश और हनुमान की प्रतिमा है जबकि द्वारा से गर्भ गृह जाने का रास्ता दो शेरों से होकर गुजरता है जो देवी की सवारी भी है। मंदिर के गर्भ गृह में तीन प्रतिमाएं स्थित हैं। बीच में नैना देवी हैं जबकि उनके दाईं ओर देवी काली और बाईं ओर उनके पुत्र गणेश की प्रतिमा स्थित है।

मंदिर प्रवेश द्वार

दर्शन के लिए निकल रहे हैं तो रास्ता भी कर लें मालूम
मंदिर के दर्शन के लिए सदियों से श्रद्धालु शिवालिक पर्वत की चढ़ाई कर रहे हैं। वर्षों तक श्रद्धालुओं को 1.5 किलोमीटर की कठिन चढ़ाई करते हुए मां के दर्शन करने होते थे लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया मंदिर प्रशासन को यह महसूस हुआ कि उसे चढ़ाई सरल बनाने के लिए इंतजाम करना चाहिए क्योंकि जिन श्रद्धालओं के पैर में तकलीफ होती थी वे मां के दर्शन से वंचित रह जाते थे। श्रद्धालुओं की परेशानी को देखते हुए यहां उड़नखटोले की व्यवस्था की गई है।

मंदिर में लंगर की व्यवस्था 

धरती से मंदिर तक चढ़ाई तो उड़नखटोले से हो गई लेकिन तीर्थस्थल तक पहुंचने के लिए क्या इंतजाम है ? यह जानना आपके लिए विशेष रूप से जरूरी है जब आप भारत में बिल्कुल नए हैं। तीर्थस्थल तक जाने के लिए यूं तो रेल और हवाई दोनों मार्ग उपलब्ध हैं लेकिन बिलासपुर पहुंचने के बाद आपको सड़क यात्रा करनी होगी। नैना देवी से सबसे करीबी एयरपोर्ट है चंडीगढ़ जिसकी दूरी नैना देवी से 100 किलोमीटर है। एयरपोर्ट उतरने के बाद आप कैब ले सकते हैं। कैब सर्विस आपको एयरपोर्ट पर ही मिल जाएगी। यदि आप भारतीय रेल के सफर का अनुभव साथ ले जाना चाहते हैं तो फिर दिल्ली या चंडीगढ़ से आनंदपुर साहिब तक के लिए रेल ले सकते हैं। नैना देवी तीर्थस्थल से सबसे करीबी रेलवे स्टेशन आनंदपुर साहिब ही है।आनंदपुर साहिब पहुंचने के बाद आपको कैब से 30 किलोमीटर की सड़क यात्रा करने होगी।

मुफ्त धर्मशाला की व्यवस्था

तीर्थयात्रा करते वक्त आपको अपने खान-पान या फिर ठहरने के स्थान को लेकर बहुत ज्यादा चिंता करने की जरूरत नहीं है। माता के श्रद्धालुओं के लिए लंगर और धर्मशाला की व्यवस्था है। यहां तीनों पहर भोजन कराया जाता है। यहां तक कि आप जब भी पहुंचे और आपको भूख लगी हो आप मांग कर खाना खा सकते हैं। वहीं, ठहरने के इंतजाम की बात की जाए तो ट्रस्ट ने 1000 श्रद्धालुओं की क्षमता वाला धर्मशाला और मोटल बनाया है वह सेवा बिल्कुल मुफ्त उपलब्ध है। इसके अलावा ट्रस्ट के मातृ आंचल, मातृ छाया और मातृ शरण धर्मशाला में भी ठहर सकते हैं जिसमें आपको बहुत ही कम किराए पर अच्छी सुविधा मिल जाएगी।

वैष्णो देवी की तरह यहां भी पहाड़ी पर कई प्राइवेट होटल हैं और साथ ही हिमाचल प्रदेश का सरकारी गेस्ट हाउस भी पहाड़ी पर स्थित है। श्रद्धालुओं को यह सुझाव दिया जाता है कि आप जब भी नैना देवी के दर्शन की तैयारी करें तो ट्रस्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर नई जानकारियों से खुद को जरूर अपडेट कर लें।

फोटो साभार : सभी तस्वीरें 'जय माता श्री नैना देवी' की आधिकारिक वेबसाइट से ली गई हैं।