महाभारत काल की गवाही देता यह पारिजात का वृक्ष

पौराणिक कथाओं में पारिजात को कल्पृक्ष और देववृक्ष नामों से भी जाना जाता है। पारिजात पर सफेद रंग के फूल खिलते हैं, जिनका निचला हिस्सा चटख नारंगी होता है। फूल रात में खिलते हैं और सुबह पेड़ से झड़ जाते हैं। फूलों की सुगंध मन मोह लेती है। इस पेड़ की परिक्रमा करके मांगी गई सारी मनौतियां पूरी होती हैं।

महाभारत काल की गवाही देता यह पारिजात का वृक्ष

भारत स्थित उत्तर प्रदेश राज्य में बाराबंकी से 38 किलोमीटर दूर पूरब में स्थित है किंतूर गांव। इस गांव का नाम पांडवों की मां कुंती के नाम पड़ा। इसी गांव में मौजूद है 5000 साल पुराना पारिजात का वृक्ष। पौराणिक धारणा के अनुसार समुद्र मंथन से मिले 14 रत्नों में से एक रत्न कल्पवृक्ष था , जिसे देवगण स्वर्ग ले गए थे।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार स्वर्गलोक में यह इंद्र के नंदनवन की शोभा बढ़ाया करता था। अज्ञातवास के दौरान पांडवों की माता कुंती ने शिव पूजन के लिए पारिजात पुष्पों की इच्छा जताई। तब अर्जुन ने इसे स्वर्गलोक से लाकर धरती पर लगाया। माना जाता है कि अर्जुन ने अपने बाण से पाताल तक छेद करके इसे रोपित किया था। पारिजात से जुड़ी अन्य कथाओं के बीच यह कथा सबसे ज़्यादा स्वीकारी गई है। एक अन्य कथा के अनुसार श्री कृष्ण इस वृक्ष को सत्यभामा के लिए लाए थे।