श्रीलंका में सेना भेजने की मीडिया रिपोर्ट फर्जी व झूठी: भारतीय उच्चायोग

श्रीलंका की स्थिति पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में भारत ने कहा कि भारत श्रीलंका के लोकतंत्र, स्थिरता और आर्थिक सुधार का पूरी तरह से समर्थन करता है। मीडिया और सोशल मीडिया में भारत द्वारा श्रीलंका में अपनी सेना भेजने के बारे में चल रही रिपोर्टों को भारत स्पष्ट रूप से खंडन करना चाहेगा।

श्रीलंका में सेना भेजने की मीडिया रिपोर्ट फर्जी व झूठी: भारतीय उच्चायोग

श्रीलंका में भारतीय सैनिकों को भेजने से जुड़ी खबरों को श्रीलंका में मौजूद भारतीय उच्चायोग ने स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया है। उच्चायोग ने बताया कि भारत श्रीलंका के लोकतंत्र, स्थिरता और आर्थिक सुधार का पूरा समर्थन करता है। यह फर्जी और स्पष्ट रूप से झूठी खबरें हैं कि भारत सरकार श्रीलंका में सेना भेज रहा है और श्रीलंका के पूर्व प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे और उनका परिवार का कोई सदस्य भारत भागकर आया है या उन्हें भारत ने पनाह दी है।

प्रदर्शनकारियों ने सत्ताधारी पार्टी के राजनेताओं की कई संपत्तियों को भी आग लगा दी है।

दरअसल महिंदा राजपक्षे के सोमवार को इस्तीफे के बाद से उनके ठिकाने के बारे में कयास लगाए जा रहे हैं। यह बताया गया था कि महिंदा ने अपने कार्यालय और आधिकारिक निवास टेंपल ट्रीज को छोड़ दिया था। श्रीलंका की स्थिति पर अपनी पहली प्रतिक्रिया में भारत ने कहा कि भारत श्रीलंका के लोकतंत्र, स्थिरता और आर्थिक सुधार का पूरी तरह से समर्थन करता है। मीडिया और सोशल मीडिया में भारत द्वारा श्रीलंका में अपनी सेना भेजने के बारे में चल रही रिपोर्टों को भारत स्पष्ट रूप से खंडन करना चाहेगा।

मालूम हो कि 76 वर्षीय महिंदा ने देश में अभूतपूर्व आर्थिक उथल-पुथल के बीच प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। दरअसल उनके समर्थकों ने सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों पर हमला कर दिया था और उन्होंने अधिकारियों को देशव्यापी कर्फ्यू लगाने और राजधानी में सेना के जवानों को तैनात करने के लिए प्रेरित किया था। इसके कुछ ही घंटों के बाद राजपक्षे के समर्थक राजनेताओं के खिलाफ व्यापक हिंसा शुरू हो गई।

श्रीलंका में झड़पों से अभी तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 250 से अधिक लोग घायल हो गए हैं। वहीं प्रदर्शनकारियों ने सत्ताधारी पार्टी के राजनेताओं की कई संपत्तियों को भी आग लगा दी है। राष्ट्रपति गोटाबाया ने प्रदर्शनकारियों से हिंसा और बदले की कार्रवाई को रोकने का आग्रह किया है और देश के सामने आने वाले राजनीतिक और आर्थिक संकट को दूर करने की कसम खाई है।

बता दें कि 1948 में ब्रिटेन से स्वतंत्र होने के बाद से श्रीलंका अपने सबसे खराब आर्थिक संकट का सामना कर रहा है। संकट आंशिक रूप से विदेशी मुद्रा की कमी के कारण होता है जिसका अर्थ है कि देश मुख्य खाद्य पदार्थों और ईंधन के आयात के लिए भुगतान नहीं कर सकता। इसका असर जरूरतों के सामानों की कीमतों पर काफी तेजी से होता है। श्रीलंका में नौ अप्रैल से अब तक हजारों प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर चुके हैं।