विद्रोह से विभाजन तक लगातार 'रंग' बदलती रही देश की आजादी

भारत में कई शासक और लुटेरे आए। अधिकतर ने इस देश को लूटा तो कुछ ने शासन किया। अंग्रेजों ने भी भारत पर शासन किया, लेकिन उनका मकसद देश की दौलत और भंडार को अपने देश में पहुंचाना था। इसके खिलाफ विद्रोह हुआ, आजादी की मशाल जली, विभाजन के साथ भारत आजाद हुआ।

विद्रोह से विभाजन तक लगातार 'रंग' बदलती रही देश की आजादी

पुराने समय में जब पूरी दुनिया के लोग भारत आने के लिए उत्‍सुक रहा करते थे। फारसियों के बाद ईरानी और पारसी भी भारत में आकर बस गए। उनके बाद मुगल आए और वे भी भारत में स्‍थायी रूप से बस गए। कई ऐसे आक्रमणकारी थे जो भारत को लूटने आते थे और अपने वतन लौट जाते थे। इनके नाम इतिहास की किताबों में दर्ज है। इस कड़ी में अंग्रेज आए। उनका मकसद भारत में व्यापार करना था, लेकिन अनुकूल परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने भारत पर 'कब्जा' कर लिया।

अंग्रेजों का मकसद भारत में व्यापार करना था, लेकिन उन्होंने भारत पर 'कब्जा' कर लिया। 

इन ब्रिटिश यानी अंग्रेजों ने 200 साल तक भारत पर शासन किया। वर्ष 1757 ने प्‍लासी  युद्ध के बाद ब्रिटिश आर्मी व शासन ने भारत पर राजनैतिक अधिकार ले लिया। उनका प्रभुत्‍व लॉर्ड डलहौजी के कार्यकाल में ही स्‍थापित हो गया जो 1848 में गवर्नर जनरल बने थे। उन्‍होंने पंजाब, पेशावर और भारत के उत्तर पश्चिम से पठान जनजातियों को संयुक्‍त किया। और वर्ष 1856 तक ब्रिटिश अधिकार और उनके प्राधिकारी यहां पूरी मजबूती से स्‍थापित हो गए। ब्रिटिश साम्राज्‍य में 19वीं शताब्‍दी के मध्‍य में अपनी नई ऊंचाइयां हासिल की।

1857 में भारतीय विद्रोह

भारत पर विजय, जिसे प्‍लासी के संग्राम (1757) से आरंभ हुआ माना जा सकता है, व्‍यावहारिक रूप से 1856 में डलहौजी के कार्यकाल का अंत था। किसी भी अर्थ में यह सुचारु रूप से चलने वाला मामला नहीं था, क्‍योंकि लोगों में असंतोष बढ़ने लगा था। 1857 का विद्रोह, जो मेरठ में सैन्‍य कर्मियों की बगावत से शुरू हुआ, जल्‍दी ही फैल गया और इससे ब्रिटिश शासन को एक गंभीर चुनौती मिली। लेकिन ब्रिटिश शासन इसे एक वर्ष के अंदर ही दबाने में सफल रहा, यह निश्चित रूप से एक ऐसी क्रांति थी जिसमें भारतीय शासक, जनसमूह और नागरिक सेना शामिल थी, जिसने इतने उत्‍साह से इसमें भाग लिया कि इसे भारतीय स्‍वतंत्रता का पहला संग्राम कहा जा सकता है।

एक वर्ष तक चलती रही अंग्रेजों के खिलाफ बगावत

विद्रोह में बगावती सेना ने जल्‍दी ही दिल्‍ली पर कब्‍जा कर लिया और यह क्रांति एक बड़े क्षेत्र में फैल गई 

इस विद्रोह में बगावती सेना ने जल्‍दी ही दिल्‍ली पर कब्‍जा कर लिया और यह क्रांति एक बड़े क्षेत्र में फैल गई और देश के लगभग सभी भागों में इसे हाथों हाथ लिया गया। इसमें सबसे भयानक युद्ध दिल्‍ली, अवध, रोहिलखण्‍ड, बुंदेल खण्‍ड, इलाहबाद, आगरा, मेरठ और पश्चिमी बिहार में लड़ा गया। विद्रोही सेनाओं में बिहार में कुंवर सिंह के तथा दिल्‍ली में बख्‍तखान के नेतृत्‍व में ब्रिटिश शासन को एक करारी चोट दी। कानपुर में नाना साहेब ने पेशावर के रूप में उद्घोषणा की और तात्‍या टोपे ने उनकी सेनाओं का नेतृत्‍व किया जो एक निर्भीक नेता थे। झांसी की रानी लक्ष्‍मी बाई ने ब्रिटिश के साथ एक शानदार युद्ध लड़ा और अपनी सेनाओं का नेतृत्‍व किया। भारत के हिन्‍दु, मुस्लिम, सिख और अन्‍य सभी वीर पुत्र कंधे से कंधा मिलाकर लड़े और ब्रिटिश राज को उखाड़ने का संकल्‍प लिया। इस क्रांति को ब्रिटिश राज द्वारा एक वर्ष के अंदर नियंत्रित कर लिया गया जो 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुई और 20 जून 1858 को ग्‍वालियर में समाप्‍त हुई।