डायस्पोरा पॉलिसीः कभी हाशिए पर थे, आज कर रहे देश निर्माण

भारत जो कभी विदेश में रह रहे भारतीयों के मसले पर फूंक फूंककर कदम उठाता था वहीं आज उनके साथ न केवल मजबूती से खड़ा दिखता है बल्कि देश के स्वर्णिम भविष्य के लिए उनकी मदद लेने में संकोच नहीं कर रहा है।

डायस्पोरा पॉलिसीः कभी हाशिए पर थे, आज कर रहे देश निर्माण

दुनियाभर में प्रवासी भारतीयों की संख्या 3.2 करोड़ के आसपास है और ये केवल गंतव्य देश ही नहीं बल्कि भारत के लिए भी उतने ही मायने रखते हैं। वतन से दूर कोई मजबूरी ही खींच ले जाती है और मजबूरी होती है शिक्षा और रोजगार का अवसर, सिर्फ इसलिए कि कोई इन वजहों से देश से दूर है तो उसके  संरक्षण के लिए कुछ न किया जाए और उन्हें पराए देश में अकेला छोड़ दिया जाए। यह भारत की नीति नहीं है। भारत न केवल देश निर्माण में उन्हें भागीदार बना रहा है बल्कि मुसीबत के वक्त उनके लिए खड़ा भी रहता है। भारत ने अपनी डायस्पोरा नीति को समय के साथ बदला ताकि उनकी प्रतिभा और कौशल का इस्तेमाल स्वर्णिम भारत के लिए किया जा सके।

यूं भारत के लिए खास बन गए प्रवासी
भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश का नेतृत्व संभालने वाले कांग्रेस नेता राजीव गांधी पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने भारत की डायस्पोरा नीति में बदलाव किया। उन्होंने 80 के दशक में डायस्पोरा नीति में बदलाव करते हुए उन्हें भारत आने का न्योता दिया। तत्कालीन सरकार को यह अहसास था कि डायस्पोरा देश के भविष्य के लिए कितना महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं औऱ इसलिए राजीव गांधी सरकार ने विदेश में रह रहे भारतीयों को देश के निर्माण में भागीदार बनने का न्योता दिया। उन्होने इसके लिए ठीक वही नीति अपनाई जो कि पड़ोसी देश चीन उस वक्त अपना रहा था।

भारत ने अपनी डायस्पोरा नीति को समय के साथ बदला ताकि उनकी प्रतिभा और कौशल का इस्तेमाल स्वर्णिम भारत के लिए किया जा सके।