अमेरिकी इंटेलीजेंस का दावा: भारत-चीन संबंध अभी 'तनावपूर्ण' रहेंगे

रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच 2020 के बाद से हालात तनावपूर्ण हैं और आगे भी बने रहेंगे। यह हालात दशकों में सबसे ज्यादा गंभीर हैं। दोनों देशों की ओर से वर्तमान में संवेदनशील क्षेत्र में लगभग 50,000 से 60,000 सैनिक हैं।

अमेरिकी इंटेलीजेंस का दावा: भारत-चीन संबंध अभी 'तनावपूर्ण' रहेंगे

गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से अभी तक दोनों देशों के बीच रिश्तों में सुधार नहीं हुआ है। अमेरिकी इंटेलीजेंस कम्युनिटी ने अमेरिकी सांसदों के सामने इस मसले पर कहा है कि भारत और चीन के बीच संबंध आगे भी तनावग्रस्त रहेंगे। इसके अलावा कम्युनिटी ने भारत और पाकिस्तान के बीच भी संभावित संकट पर चिंता व्यक्त की है।

बीते दिन अमेरिकी कांग्रेस की सुनवाई के दौरान सीनेट की सशस्त्र सेवा समिति यानी सीनेट आर्म सर्विस कमेटी के सामने अमेरिकी इंटेलीजेंस कम्युनिटी ने खतरे का आकलन करने वाली अपनी सालाना रिपोर्ट पेश की और बताया कि विवादित सीमा पर भारत और चीन दोनों देशों द्वारा सैन्य क्षमता को बढ़ाने से दो परमाणु शक्तियों के बीच सशस्त्र टकराव का खतरा बढ़ जाता है। इसका असर अमेरिकी हितों, समुदाय और हस्तक्षेप पर भी पड़ता है।

सालाना रिपोर्ट में कहा गया है कि दोनों देशों के बीच 2020 के बाद से हालात तनावपूर्ण हैं और आगे भी बने रहेंगे। यह हालात दशकों में सबसे ज्यादा गंभीर हैं। भारत लगातार यह मानता रहा है कि द्विपक्षीय संबंधों और समग्र विकास के लिए एलएसी पर शांति बनी रहे। हालांकि 5 मई 2020 के दिन पैंगोंग झील क्षेत्र में हिंसक झड़प के बाद भारतीय और चीनी सेनाओं के बीच पूर्वी लद्दाख सीमा पर गतिरोध शुरू हो गया। इसके बाद से ही दोनों देशों ने धीरे-धीरे हजारों सैनिकों के साथ-साथ भारी हथियारों को लेकर अपनी तैनाती बढ़ा दी।

भारत और चीन ने पूर्वी लद्दाख विवाद को सुलझाने के लिए अब तक 15 दौर की सैन्य वार्ता की है। वार्ता के परिणामस्वरूप दोनों पक्षों ने पिछले साल पैंगोंग झील के उत्तर और दक्षिण तट पर और गोगरा क्षेत्र में अपनी सेनाओं को पीछे किया। हालांकि फिर भी दोनों देशों की ओर से वर्तमान में संवेदनशील क्षेत्र में लगभग 50,000 से 60,000 सैनिक हैं।

अमेरिकी इंटेलीजेंस कम्युनिटी की रिपोर्ट में यह भी आंकलन किया गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच भी गतिरोध चिंता का विषय है। दरअसल पाकिस्तान का भारत विरोधी आतंकवादी समूहों का समर्थन करने का एक लंबा इतिहास रहा है। वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चेतावनी देने की बजाय वास्तविक तौर पर सैन्य बल के साथ प्रतिक्रिया करने की संभावना पहले की तुलना में अधिक है।