ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका समेत 11 देशों में अब ऐसे पहुंचेगी भगवद् गीता व तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस

गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना वर्ष 1923 में सनातन धर्म के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। गीता प्रेस ने भगवद गीता की विभिन्न संस्करणों में करीब 41 करोड़ प्रतियां प्रकाशित की हैं। जबकि श्रारीमचरितमानस की 7 करोड़ प्रतियां प्रकाशित हई हैं। इसकेअभिलेखागार में 3,500 से अधिक पांडुलिपियां हैं।

ऑस्ट्रेलिया-अमेरिका समेत 11 देशों में अब ऐसे पहुंचेगी भगवद् गीता व तुलसीदास की श्रीरामचरितमानस

हिंदू धर्म के ग्रंथों, पाठ, पुस्तकों आदि का सबसे बड़ा प्रकाशन गीता प्रेस गोरखपुर अब भारत से बाहर 11 देशों में अपने आउटलेट खोलने की योजना बना रहा है। यह जानकारी गीता प्रेस के अंतरराष्ट्रीय संयोजक जय किशन सारदा ने साझा की है। सारदा और उनकी पत्नी सुमित्रा शारदा दोनों भारतीय मूल के हैं और कई पीढ़ियों से नेपाल में रह रहे हैं।

गीता प्रेस की स्थापना 1923 में जय दयाल गोयंका और घनश्याम दास जालान ने सनातन धर्म के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए की थी। 

किशन सारदा वर्ष 2016 से पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में नेपाल में गीता प्रेस बुक डिपो का प्रबंधन कर रहे हैं। नेपाल में आए भूकंप में बचाए जाने के बाद जय किशन सारदा ने समाज सेवा करने का भी फैसला किया है। सारदा ने बताया कि पिछले सप्ताह गोरखपुर में गीता प्रेस शताब्दी कार्यक्रम के दौरान भारत के राष्ट्रपति कोविंद को सुनने के बाद हम अत्यधिक प्रेरित हुए और तभी से हमनें अन्य देशों में गीता प्रेस स्टोर खोलने की योजना बनाई है।

राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि उनका सचिवालय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किताबों तक पहुंचने में मदद करेगा। कई देशों में मेरे कई संपर्क हैं और हम 11 देशों में भारतीय और नेपाली मूल के लोगों के साथ अपने-अपने देशों में आउटलेट खोलने के लिए समन्वय कर रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि उनकी ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, दुबई, हांगकांग, इंडोनेशिया, सिंगापुर, यूके, घाना, केन्या, थाईलैंड और म्यांमार में आउटलेट खोलने की योजना है।

गीता प्रेस गोरखपुर की स्थापना 1923 में जय दयाल गोयंका और घनश्याम दास जालान ने सनातन धर्म के सिद्धांतों को बढ़ावा देने के लिए की थी। गीता प्रेस अभिलेखागार में 3,500 से अधिक पांडुलिपियां हैं, जिनमें भगवद् गीता की 100 से अधिक व्याख्याएं शामिल हैं। अपनी स्थापना के बाद से गीता प्रेस ने भगवद् गीता की लगभग 41 करोड़ प्रतियां (विभिन्न संस्करणों में) प्रकाशित की हैं। जबकि श्रीरामचरितमानस की 7 करोड़ प्रतियां प्रकाशित की हैं। सभी प्रतियां गीता प्रेस ने रियायती कीमतों पर प्रकाशित की हैं।