राजनीति के शतरंज में लंगड़ी चाल चलती बीजेपी को मोदी ने अश्वमेधी बनाया

आज भारत की प्रमुख राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी का स्थापना दिवस है। मशहूर साहित्यकार प्रेमचंद ने कहा था कि उनके जीवन में हलके-फुलके गड्ढे तो हैं लेकिन पहाड़ और खाइयां नहीं है। लेकिन बीजेपी के मार्ग में पहाड़ और खाईयां बहुत रही हैं। पढ़िए इस पार्टी के अश्वमेध बनने की कहानी।

राजनीति के शतरंज में लंगड़ी चाल चलती बीजेपी को मोदी ने अश्वमेधी बनाया

भारत की प्रमुख राजनैतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी (BJP) का आज स्थापना दिवस है। इस अवसर पर यह सवाल बनता है कि कैसे यह पार्टी राजनीति के शतरंज में ‘बादशाह’ बन गई। कभी इस खेल में बीजेपी लंगड़े घोड़े की तरह चाल चलती रही, लेकिन फिर राजनीति की पिच पर सरपट दौड़ने लगी। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि यह पार्टी अपने नेता नरेंद्र मोदी के बल पर देश की सत्ता में मजबूती से आई। लेकिन इस बदलाव को चमत्कार नहीं कहा जा सकता। उसका कारण यह है कि इस पार्टी के पास लाखों समर्पित और कॉडर कार्यकर्ता हैं जो लाख निराशा और बेचैनी के बावजूद ‘चिड़िया की आंख’ पर टकटकी लगाए रखे। बस, नरेंद्र मोदी ने अपनी मेहनत, हठधर्मिता और अलग कार्यप्रणाली से उस ‘आंख’ को भेद दिया है।

पार्टी अपने नेता नरेंद्र मोदी के बल पर देश की सत्ता में मजबूती से आई। 

सत्ता का स्वाद चखा, जिसने प्राणवायु का काम किया

नरेंद्र मोदी ने क्या-क्या किया, उस पर बात करने से पहले बीजेपी के राजनैतिक उत्थान की बात कर ली जाए। बीजेपी की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई लेकिन उसे चुनाव लड़ने का मौका साल 1984 में मिला। लोकसभा के इस चुनाव में उसे मात्र दो सीटें मिली, क्योंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश ने कांग्रेस को प्रचंड बहुमत दिया और बीजेपी और उसके खांटी-आधुनिक नेता इस लहर में खेत रहे। वर्ष 1989 के चुनाव में बीजेपी को 89 सीटें मिलीं और उसने जनता दल के नेता वीपी सिंह के साथ मिलकर सत्ता का स्वाद चखा, लेकिन यह अनुभव उसके लिए चमत्कारिक के बजाय निराशानजक रहा। बस नया यह हुआ की बीजेपी ने सत्ता का स्वाद चख लिया जो किसी भी पार्टी के लिए प्राणवायु का काम करता है।

जनता दल के नेता वीपी सिंह।

सरकार बनी, बहुत प्रभावी नहीं रही, 10 साल वनवास झेला

साल 1996 के हुए चुनाव में गठबंधन के बूते बीजेपी ने सरकार तो बनाई, लेकिन वह विपक्ष की चालों को समझ नहीं पाई और 13 दिन में ही सरकार का अंत हो गया। दो साल बाद फिर से बीजेपी को अपने सर्वमान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाने का मौका मिला। लेकिन यह सरकार भी 13 महीने में ही निपट गई। वर्ष 1999 में बीजेपी ने देश के 20 राजनैतिक दलों के साथ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ा। सरकार बनी, परंतु इस बार उसके हाथ बंधे हुए थे। बीजेपी के पास 182 सांसद थे, लेकिन सहयोगी दलों ने उसकी नाक में नकेल डालकर रखी, परिणाम यह रहा कि यह सरकार न तो देश हित में क्रांतिकारी कदम उठा पाई और न ही अपनी अमिट अभिलाषा ‘हिंदुत्व’ को प्रभावी तरीके से आगे बढ़ा पाई। इसके बाद बीजेपी को 10 साल का राजनैतिक वनवास झेलना पड़ा।

बीजेपी के सर्वमान्य नेता अटल बिहारी वाजपेयी। 

नरेंद्र मोदी के आने से बदला राजनैतिक परिदृश्य

इसके बाद भारत का राजनैतिक परिदृश्य बदलना शुरू हुआ जब बीजेपी आलाकमान ने वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव आने से पहले ही गुजरात राज्य में 15 साल से मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। अब हम आपको बताते हैं कि अपने-परायों के ‘चक्रव्यूह’ में घिरे मोदी ने किस तरह राजनीति की बिसात पर अश्वमेध दौड़ाया। उनकी छवि को विवादास्पद बनाने के प्रयास किए गए और कहा गया कि वह भारत के लोकतांत्रिक और सौहार्द से भरे ताने-बाने को बिखेर देंगे। लेकिन गुजरात में सीएम के दौरान उनके विकासपरक कार्य, गुजरात को दंगामुक्त राज्य बनाना तो उनके लिए प्लस ही रहा, साथ ही सालों से भारत की कथित धर्मनिरपेक्ष छवि से परेशान और अकुला रहे हिंदुओं के मन में नरेंद्र मोदी को लेकर अपनापा जागा। इस तरह मोदी की राह से कुहासा छंटना शुरू हो गया।

बीजेपी आलाकमान ने वर्ष 2014 का लोकसभा चुनाव आने से पहले ही नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। 

देश हित सबसे पहले, तुष्टिकरण किसी का नहीं

पीएम मोदी ने जनमानस में छवि छोड़ी कि वह देश-हित के लिए कुछ भी करने से पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए कड़े कदम उठाए, आम जन के लिए विकास की योजनाएं शुरू की और विदेश नीति को लगातार मजबूत बनाया। उन्होंने देश और विश्व तक यह संदेश पहुंचाया कि भारत हित हर हाल में होगा, लेकिन तुष्टिकरण किसी का नहीं। उनके लिए सब समान हैं।

अकुलाया हिंदुत्व और 'रामराज' का सपना

हम फिर बीजेपी की ओर लौटते हैं। असल में बीजेपी यूं ही इतनी ऊंचाई पर नहीं आ गई। असल में इसके पीछे लाखों समर्पित कार्यकर्ता तो है ही, सालों से अकुला रहा हिंदूत्व भी है। इस सोये हिंदुत्व को पार्टी नेताओं ने सीधे तौर पर उजागर नहीं किया, लेकिन कर्मों-उद्देश्यों से जब तक जाहिर करते रहे। वर्ष 1990 में अयोध्या में रामभक्तों पर गोलीबारी ने हिंदुओं में जो आक्रोश पैदा किया, उसे बीजेपी ने ‘समझा।’ उसी आक्रोश ने वर्ष 1992 में अयोध्या में विवादास्पद ढांचा गिराकर ‘रामराज’ का सपना देखा। लोगों को लगा कि अब बीजेपी उनकी सुनेगी, जो सालों से धर्मनिरपेक्षता और तुष्टिकरण से व्यथित थे। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।

बीजेपी और मोदी धुरी बने लेकिन...

इस दौरान पानी बहुत बह गया है। बीच के सालों में बीजेपी की सरकार बनी लेकिन वह लंगड़ी चाल ही चलती रही। उसे न खुदा मिला और न ही विसाले सनम। लेकिन जो अग्नि देश के एक बहुत बड़े वर्ग में प्रज्ज्वलित हो चुकी थी, वह दब तो गई लेकिन बुझ नहीं पाई। ऐसे में नरेंद्र मोदी का देश की राजनीति में उदय हुआ। बीजेपी को अनुरूप नेता मिल गया और देश की बड़ी आबादी को उनका सच्चा-सेवक, जो सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास चाहता है। फिलहाल भारत की राजनीति में बीजेपी और मोदी धुरी बने हुए हैं। लेकिन यह धुरी तब और मजबूत होगी जब भारत आगे बढ़ेगा और शांति रहेगी। उसके बाद बीजेपी के लिए कुछ भी संभव है।