अथर्ववेद के मंत्र से मोह को योग से जीतने का यत्न

मन का आंगन परिजनों की स्मृति से घिरा रहता था और देह का स्वभाव भारतीय समय के अनुराग को नहीं छोड़ पा रहा था। रात को नींद नहीं आती थी और दिन को जागने का मन नहीं होता था।

अथर्ववेद के मंत्र से मोह को योग से जीतने का यत्न

अमेरिका यात्रा- अंक 13

वाशिंगटन डीसी, डुपोंट सर्किल के पास पी-स्ट्रीट पर मेरिएट ग्रुप की ‘रेजिडेंसी इन’ होटल में ठहरने की व्यवस्था थी। यह होटल भारतीय दूतावास से लगभग डेढ़ सौ गज की दूरी पर था। निःसंदेह होटल की व्यवस्था बहुत अच्छी थी। एक बड़े कमरे में ही सोफा, पलंग, रसोई व अन्य आवश्यक सुविधाएं थीं।

तिरंगे को देखकर मैंने अपने संकल्प की अग्नि को और अधिक प्रदीप्त अनुभव किया। 

लहराता तिरंगा
नित्य कर्म के बाद मूंग के लड्डू, मठरी और बाजरे की टिकिया खाकर राजदूतावास की ओर बढ़ रहा था। फेयरफैक्स होटल के कोने से गांधी प्रतिमा व दूतावास के भवन पर दृष्टि पड़ी। हमारे हृदय का निकटतम देवता व भारत की साधना, समृद्धि व शांति का प्रतीक तिरंगा इठलाता हुआ लहरा रहा था। उसमें बन रहे वलयों की गति मुझे सप्तसिंधु की लहरों पर बिठाकर भारत से मिला रही थी। तिरंगे को देखकर मैंने अपने संकल्प की अग्नि को और अधिक प्रदीप्त अनुभव किया एवं अन्तस् में बसे निज राष्ट्रभाव को वंदन के लिए नत था।