आइए दिखाते हैं आपको किन्नरों का धार्मिक स्थल, जहां वे मन्नत मांगने जाते हैं

किन्नरों का खानकाह नाम का यह धार्मिक स्थल 15वीं सदी में बनाया गया था। यह उस वक्त की बात है, जब मुगलों ने भारत में आना शुरू किया था। यहां किन्नर समुदाय के लोग गुरुवार और शुक्रवार को छोटे- बड़े समूह में प्रार्थना और दुआ मांगने आते हैं।

आइए दिखाते हैं आपको किन्नरों का धार्मिक स्थल, जहां वे मन्नत मांगने जाते हैं

धर्म के आधार पर तो ईश्वर को याद करने के लिए अलग-अलग धार्मिक स्थल तो बने हुए खूब देखे होंगे। लेकिन कभी सोचा है कि लिंग के आधार पर भी धार्मिक स्थल हो सकता है? सोचेंगे तो जवाब शायद नहीं में ही मिले। लेकिन यह हकीकत है कि दिल्ली में एक ऐसा धार्मिक स्थल है, जिसको लेकर एक लिंग विशेष के ही लोगों के बीच ही मान्यता देखने को मिलती है। यह लिंग विशेष और कोई नहीं, बल्कि समाज से अलग किया हुआ किन्नर समुदाय है। यह धार्मिक स्थल, जिसे किन्नरों का खानकाह (दरगाह या मठ)  नाम से जाना जाता है। हालांकि अन्य लोगों के लिए यहां आने जाने में कोई मनाही नहीं है। किन्नर समुदाय का यह पवित्र स्थल किन्नरों कहां स्थित है, क्यूं किन्नरों के लिए है यह खास? क्या है इस धार्मिक स्थल का इतिहास? जानिए इस खास रिपोर्ट के जरिए।

किन्नर समुदाय के लोग गुरुवार और शुक्रवार को छोटे-बड़े समूह में प्रार्थना और दुआ मांगने आते हैं। Photo : R D´Lucca from Caracas, Venezuela

क्या है इस धार्मिक स्थल का इतिहास: माना जाता है कि किन्नरों का खानकाह नाम का यह धार्मिक स्थल 15वीं सदा में बनाया गया था। यह उस वक्त की बात है, जब मुगलों ने भारत में आना शुरू किया था।

किसे कहते हैं खानकाह: खानकाह एक फारसी शब्द है, जिसका अर्थ उस इमारत या स्थल (दरगाह या मठ) से होता है, जहां एक समुदाय के लोग एक साथ इकट्ठा होकर शांति की दुआ करते हैं।

कहां है किन्नरों का खानकाह: साउथ दिल्ली का महरौली क्षेत्र ऐतिहासिक इमारतों व स्थलों से भरा हुआ है। यह टूरिस्ट के लिए सबसे ज्यादा लोकप्रिय जगह है। दरअसल, कुतुब मीनार के अलावा कई मकबरे यहां बने हुए हैं। लेकिन इन सभी मशहूर इमारतों के बीच किन्नर समुदाय का धार्मिक स्थल किन्नरों का खानकाह भी मौजूद है। साउथ दिल्ली के महरौली विलेज में सुफी संत कुतुबूदीन बख्तियार की दरगाह से कुछ ही कदमों की दूरी पर किन्नर समुदाय का पवित्र स्थल बना हुआ है।

सफेद रंग की दीवारों से बने इस धार्मिक स्थल में 50 कब्र हैं, जिनकी मान्यता है कि यह लोधी काल यानी 15वीं सदी की बनी हुई हैं। photo : https://www.flickr.com/photos/varunshiv/3701567814/

कैसा है किन्नरों का खानकाह: किन्नरों का खानकाह का प्रमुख द्वारा एक लोहे का गेट है, जो ज्यादातर खुला रहता है। जब हम इस गेट से प्रवेश करते हैं, तो एक काफी संकरा गलियारा बना हुआ है। जिस पर तीन से चार सीढ़ियां हैं। इन सीढ़ियों को चढ़ने के बाद खुले आसमान के नीचे यह धार्मिक स्थल है। वैसे तो  धार्मिक स्थल दिखने में एक पुरानी मस्जिद लगती है, लेकिन हर वक्त खाली ही दिखाई पड़ती है। सफेद रंग की दीवारों से बने इस धार्मिक स्थल में 50 कब्र हैं, जिनकी मान्यता है कि यह लोधी काल यानी 15वीं सदी की बनी हुई हैं। यहां एक भी नई कब्र दिखाई नहीं देती। खानकाह की जमीन से लेकर दीवारें भी साफ सुथरी रहती हैं। मानों, हर वक्त साफ सफाई रहती हो।

क्यों आते हैं यहां किन्नर: इस धार्मिक स्थल को लेकर किन्नरों की बीच काफी मान्यता है। यहां किन्नर समुदाय के लोग गुरुवार और शुक्रवार को छोटे- बड़े समूह में प्रार्थना और दुआ मांगने आते हैं। स्थल में बनी कब्र पर फूल चढ़ाने के अलावा बाहर बैठे गरीबों को पैसे और खाना भी बांटते हैं। हालांकि, सबसे अधिक किन्नरों की संख्या मुर्हरम और शब-ए-बरात वाले दिन देखने को मिलती है।