विशेष लेखः भारत से बढ़कर कुछ नहीं, अनंत ब्रह्म के समान है यह प्राचीनतम देश

शाश्वत मूल्यों पर आधारित भारतीय दर्शन सदैव विश्व कल्याण के मोती बिखेरता रहा है।

विशेष लेखः भारत से बढ़कर कुछ नहीं, अनंत ब्रह्म के समान है यह प्राचीनतम देश

अमेरिकी यात्रा की तैयारी- 6/पांचवा रत्न - भारत की माटी ।

मनुष्य के वश में नहीं है कि वह कहां व कब जन्म ले! मैं भारत में जन्मा यह मेरा सौभाग्य अवश्य है, किंतु मेरा जन्म भारत में ही हो यह मेरे वश में नहीं हो सकता था।

मेरा जन्म भारत की प्राचीनतम आर्य परंपरा में हुआ, यह मेरे लिए अभिमान का विषय है। मुझे इस बात का भी परम संतोष है कि मैं किसी व्यक्ति विशेष द्वारा चलाए गए अर्वाचीन मत संप्रदाय को मानने वाले कुल मैं पैदा नहीं हुआ। यद्यपि वे लोग मेरी दृष्टि में हेय नहीं हैं, जिन्हें गौरवशाली तथा प्राचीनतम वैदिक सभ्यता वाले विश्वगुरु भारत के किसी आर्य परिवार में पैदा होने का अवसर नहीं मिल सका।

यह बात ठीक है कि किसी के भारत में उत्पन्न होने मात्र से वह महान नहीं बन जाता। क्योंकि, यदि ऐसा होता तो भारत का प्रत्येक नागरिक कर्तव्यनिष्ठ, परोपकारी, धर्मात्मा तथा उच्च आदर्शों से युक्त ही होता और भारत से परे पैदा होने वाला व्यक्ति कभी महान नहीं बन पाता।

कुछ भोले लोग भारत का आकलन वर्तमान में दिखाई गई या पढ़ाई गई भ्रामक परिस्थितियों के आधार पर कर सकते हैं, जबकि भारत जैसे महान राष्ट्र को समझना अनंत ब्रह्म को समझने जैसा है।

भारत की मिट्टी को अत्यधिक सम्मान व महत्व देने के पीछे मेरे कुछ विशेष तर्क हैं।

सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा  भारत अपनी 196 करोड़ वर्ष पुरानी प्राचीनतम एवं श्रेष्ठ सांस्कृतिक विरासत वाला आधिकारिक प्रतिनिधि देश है।

भारतीय उपमहाद्वीप के अभिन्न अंग रहे त्रिविष्टप में (तिब्बत में) 1 अरब 96 करोड़ वर्ष पूर्व विश्व की श्रेष्ठतम ज्ञान निधि अर्थात् वेद का प्रकाश हुआ, जबकि विश्व के अनेक क्षेत्रों में कुछ हज़ार वर्ष पहले तक लोग नग्न शरीर व भग्न परिवार के लिए भोजन- वस्त्र की खोज में दिग्भ्रमित थे।

भारत में ही सर्वप्रथम अग्निदेव की स्तुति हुई 

यह वही भारत है जहां सर्वप्रथम अग्निदेव की स्तुति हुई अग्निमीळे पुरोहितम् *। यह अग्नि देव ही है जो मानव की प्रथम पीढ़ी को ज्ञान से युक्त एवं अंधकार से मुक्त करने का सबसे बड़ा साधन बना। इसी अग्नि देव की सहायता से मानव जीवन के समस्त व्यवहार सिद्ध हुए। *अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवेदिवे ।

आर्यावर्त्त वो भूमि है जहां सकल ज्ञान-विज्ञान के भंडार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद प्रकट हुए जिनका सार्वभौमिक, सार्वकालिक नित्य ज्ञान जनसामान्य के व्यवहार में सहज ही प्रतिष्ठित था। करोड़ों वर्ष से शिल्प, खगोल, गणित, व्याकरण, साहित्य, कृषि, यज्ञ, विमानविद्या, व्यापार, पशुपालन, गृहस्थ आदि विभिन्न आश्रमों व राजधर्म का सर्वप्रथम ज्ञान इसी धरती पर प्रसारित हुआ।

संपूर्ण भूगोल पर विजय की महत्वाकांक्षा से वशीभूत होकर इस पवित्र भूमि ने कभी भी स्त्री, बालकों, वृद्धों, रोगियों तथा निरपराध प्राणियों पर शस्त्र नहीं उठाने की नैतिकता को निभाने का सर्वोपरि मानदंड प्रस्तुत किया।

यह वही भारत है जिसने संपूर्ण विश्व को प्राचीनकाल व अर्वाचीन काल में योग की महान विद्या सिखायी।