शख्सियत: IIT छात्र रहे हैं अनूप भार्गव, अब अमेरिका में इसी तकनीक से हो रहा हिंदी का प्रसार

एक अलग ही व्यक्तित्व है अनूप भार्गव का। यह कहा जाए कि उनका जीवन विविध रंगों से सरोबार है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। एक तरफ कवि मन है, जो गुनगुनाता रहता है, हिंदी को लेकर अपनापन है तो कंप्यूटर में 'मास्टर' हें और अब पिछले 20 साल में इस फील्ड में सलाहकार की भूमिका निभा रहे हैं। जानिए उनके बारे में।

शख्सियत: IIT छात्र रहे हैं अनूप भार्गव, अब अमेरिका में इसी तकनीक से हो रहा हिंदी का प्रसार

वह भारत के राज्य राजस्थान के रहने वाले हैं। स्कूली समय से ही उन्होंने कविताएं लिखनी शुरू कर दी थी। कवि मन था। पढ़ाई-लिखाई भी ऐसे ही विषयों में करना चाहते थे। लेकिन जीवन का यथार्थ उन्हें आईआईटी में ले आया। बन गए कंप्यूटर इंजीनियर और आ गए अमेरिका। इसके बावजूद कवि मन में हिंदी और कविता को लेकर हमेशा से लगन लगी रही, एक अग्नि सी प्रज्ज्वलित होती रही। हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए कंप्यूटर की तकनीक का प्रयोग कर उसका विस्तार किया। उनके कवि मन में मातृभाषा ‘गर्भनाल’ जैसी जुड़ी रही। इसी का सुखद परिणाम है कि न्यूयॉर्क स्थित भारतीय कौंसलवाल ने अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर हिंदी पत्रिका ‘अनन्य’ प्रकाशित करने का दायित्व उन्हें सौंप दिया है। हिंदी की सेवा करते हुए इस कवि-हृदयी को अनेक सम्मानों से नवाजा जा चुका है।

भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से मिलन रहा शानदार। 

हम बात कर रहे हैं 62 वर्षीय अनूप भार्गव की। आईटी तकनीक की कई नौकरियां करने के बाद अब वह पिछले 20 साल से कंप्यूटर तकनीक में कंसलटेंट की भूमिका निभा रहे हैं। उनका पूरा जीवन-वृत्त रोमांचित करने वाला है, जो बताता है कि अपनी भाषा को लेकर कोई व्यक्ति अपने अंदर कितनी जिजिविषा पैदा कर सकता है और हमेशा उसे लेकर समर्पण भाव से गुनतारे में डूबता-उतराता रहता है। अनूप भार्गव के निजी जीवन, उनके पेशे, कवि मन और हिंदी-प्रेम को लेकर हमने विस्तार से बातचीत की। लब्बो-लुआब यही है कि हिंदी भाषा रूपी प्रसार-प्रचार ‘फिल्म’ के गंभीर निर्देशक हैं, जो अभी भी लगातार और नई-नई स्क्रिप्ट लिख रहे हैं।

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से हिंदी के प्रचार-प्रसार पर बातचीत करते हुए। 

उनके पिताजी राजस्थान में जज थे। ईमानदारी से न्याय की पताका फहराते रहे। उनका विभिन्न शहरों में तबादला होता रहा, इसके चलते पूरे प्रदेश में यहां-वहां निवास व शिक्षा-दीक्षा होती रही। आखिरी तीन साल की स्कूली शिक्षा उदयपुर स्थित विद्या भवन स्कूल से हुई। यही से हिंदी प्रेम हुआ। स्कूल के हिंदी प्राध्यापक व जाने-माने कवि भगवती लाल व्यास ने उनका हौसला बढ़ाया। स्कूल की पत्रिका के लिए अनूप ने एक कविता लिखी, लेकिन मास्टर जी को वह कुछ ‘अलग’ लगी। इसलिए उसे प्रकाशित करने के लिए लिए सरकारी पत्रिका ‘शिविरा’ में भेज दिया। यह 70 के दशक का दौर था। कविता छप गई और 21 रुपये का मानदेय मिला, जो जीवन की पहली कमाई थी।

पढ़ाई में शुरू से ही तेज थे अनूप। ‘बिरला तकनीकी और विज्ञान संस्थान’ पिलानी से स्नातक किया और फिर दिल्ली में स्नातकोत्तर (कंप्यूटर) की पढ़ाई के लिए ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, (IIT) में आ गए। हिंदी साहित्य से विधिवत नाता नहीं था, लेकिन कॉलेज और आईआईटी मैगजीन में खूब कविताई की और हिंदी को बढ़ावा देने के लिए मेहनत भी। इसी दौरान इंडो-अमेरिकन कंपनी में नौकरी लग गई। पहले भारत में ही काम किया और फिर 1983 में अमेरिका आ गए। जीवन चलता रहा। दिल्ली में रहने वाली रजनी भार्गव से विवाह हुआ। वह आज न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में हिंदी की प्रोफेसर हैं। बेटा अनुभव लंदन में नौकरी कर रहा है। बिटिया कनुप्रिया अमेरिका में सेटल है।

खुशनुमा यादें। वॉलीबुड के नामी हीरो देवानंद के साथ एक सुखद क्षण। 

यह है अनूप भार्गव के जीवन का कला पक्ष। उनका भावपक्ष भी उजास से भरा-पूरा है। कविता और हिंदी से जुड़ाव कम नहीं हुआ। जुनून का आलम यह था कि अपने खर्च पर भारत के नामी हिंदी कवियों को बुलवाते, उन्हें अपने घर पर ही टिकाते और कई शहरों में उनका कविता पाठ भी आयोजित करते रहे। इन कवियों में नीरज, सोम ठाकुर, उदय प्रताप सिंह, कुंवर बैचेन, अशोक चक्रधर, सीता सागर, संपत सरल, सुरेंद्र शर्मा आदि शामिल हैं।

हिंदी के प्रख्यात कवि नीरज अमेरिका आए तो अनूप भार्गव के घर पर ही रहे। 

करीब 10 साल तक यह आयोजन चला। जब कवि सम्मेलन चुटकुला सम्मेलन में बदलने लगे तो ‘स्वांत: सुखाय-रघुनाथा गाथा:’ का उपक्रम खत्म कर दिया। बस यह करने लगे कि भारत का कोई हिंदी कवि उनके शहर में आता है औ उसका कविता पाठ करवाने का प्रयास करते हैं।

जारी...