एडवेंचर ट्रैवेल का मन है, केरल में कई तरह की बोट रेस मन मोह लेगी आपका

पर्यटकों के साथ-साथ ऐसे एडवेंचर खेलों में रुचि रखने वाले लोगों को केरल घूमने के लिए हर मौसम सबसे अच्छा बताया जाता है। खेल और त्योहारों के बीच एक पुल की तरह काम करने वाली अधिकतर नौका दौड़ का आयोजन यहां के बैकवाटर्स में किया जाता है।

एडवेंचर ट्रैवेल का मन है, केरल में कई तरह की बोट रेस मन मोह लेगी आपका
Photo by Vinit Vispute / Unsplash

केरल भारत का अकेला ऐसा राज्य है जहां पर समुद्र बीच, बैकवाटर, झीलें, वाइल्डलाइफ, वाटरफॉल्स और वाटरस्पोर्ट्स की सुविधाएं उपलब्ध हैं। स्नेक बोट रेस यहां का प्रमुख वाटरस्पोर्ट् है। बोट रेसिंग या नौका दौड़ यहां केवल एक खेल भर ही नहीं है बल्कि एक पारंपरिक त्योहार की तरह है जो इस धार्मिक राज्य के लिए थोड़ा अनोखा है।

हालांकि मूल रूप से कमोबेश धार्मिक रहे केरल में बीते समय में नौका दौड़ का आयोजन दो प्रतिद्वंद्वी समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा या फिर किसी समझौते के समाधान के हिस्से के रूप में किया जाता था। इसके साथ ही राज्य में अभी भी पूरे साल, हर महीने और हर सत्र में मंदिरों में होने वाली गतिविधियों के दौरान नौका दौड़ का आयोजन किया जाता है।

इसलिए पर्यटकों के साथ-साथ ऐसे एडवेंचर खेलों में रुचि रखने वाले लोगों को केरल घूमने के लिए हर मौसम सबसे अच्छा बताया जाता है। खेल और त्योहारों के बीच एक पुल की तरह काम करने वाली अधिकतर नौका दौड़ का आयोजन यहां के बैकवाटर्स में किया जाता है। इस रिपोर्ट में हम आपको बताने जा रहे हैं केरल की कुछ सबसे ज्यादा लोकप्रिय नौका दौड़ों के बारे में।

नेहरू ट्रॉफी बोट रेस

केरल के अल्लप्पुझा जिले में पुन्नमदा के बैकवाटर्स पर आयोजित होने वाली नेहरू ट्रॉफी बोट रेस के दौरान अद्भुत और असाधारण नजारा बन जाता है। इस दौरान नाविकों के कई समूहों के बीच नौकायन की प्रतियोगिता होती है। इस दौड़ की उत्पत्ति की बात करें तो इसका श्रेय देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की केरल यात्रा को जाता है।

तब उनका स्वागत करने के लिए स्नेक बोट रेस आयोजित की गई थी। वह इस कार्यक्रम और इसमें भाग लेने वाले लोगों के उत्साह को देखकर खुद इतना रोमांचित और उत्साहित हो गए थे कि उन्होंने विजेता टीम को एक ट्रॉफी से सम्मानित करने का एलान किया था। तब से ही वार्षिक रूप से इस नौका दौड़ का आयोजन किया जा रहा है। नेहरू ट्रॉफी एक स्नेक बोट का छोटा स्वरूप है जो चांदी से बना गहै।

चंपाकुलम मूलम बोट रेस

अल्लप्पुझा जिले में ही पंपा नदी में होने वाली चंपाकुलम मूलम बोट रेस राज्य में पर्यटन के सबसे बड़े आकर्षणों में से एक है। पीछे की ओर से उठी हुई डिजाइन और कोबरा की तरह दिखने वाले हुड के साथ बनी नावें इस बोट रस को उस तरीके से अनोखा बनाती हैं जिस तरह चंपाकुलम बोट रेस त्योहार मनाया जाता है। इसका आयोजन जून या जुलाई के महीने में होता है जो वाटरस्पोर्ट्स के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि वर्षों पुराना यह त्योहार भगवान कृष्ण की एक नई प्रतिमा को नाव से अंबालप्पुझा के एक मंदिर लाए जाने की स्मृति में मनाया जाता है। यह प्रतिमा एक नाव के जरिए चंपाकेसरी के राजा देवनारायण के आदेश पर कुरुचि में स्थित करिकुलम मंदिर से यहां लाई गई थी।

पायिप्पड जलोत्सवम

पायिप्पड जलोत्सवम न केवल केरल में आयोजित होने वाली सबसे शानदार बोट रेस में से एक है बल्कि दक्षिण भारत में पर्यटन का एक प्रमुख आकर्षण भी है। तीन दिन तक चलने वाला यह त्योहार अलप्पुझा से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित पायिप्पड  झील पर आयोजित किया जाता है। यह कार्यक्रम सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर के देवता के सम्मान में किया जाता है।

कहानियों के अनुसार हरिपाद नामक गांव के निवासियों को एक सपना आया था कि स्वामी सुब्रमण्यम की एक प्रतिमा मंदिर के सामने कायामलूलम नदी के बिस्तर पर रखी हुई है। हैरत की बात यह है कि प्रतिमा वहीं पाई गई थी और उसे एक नाम में रख कर वहां लाया गया था जहां आज मंदिर स्थित है। वार्षिक रूप से होने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन नवंबर के महीने में होता है।

आरन्मुला उत्रट्टाति वल्लमकली

केरल की सबसे पुरानी नौका दौड़ आरन्मुला उत्रट्टाति वल्लमकली अगस्त में ओणम त्योहार के दौरान सांस्कृतिक गतिविधियों के हिस्से के तौर पर आयोजित की जाती है। यह त्योहार भगवान कृष्ण और उनके भक्त अर्जुन को समर्पित है। इस दौरान नावों की सजावट देखने वाली होती है।

नाविक सजावट वाले छातों और झंडों से अपनी नाव को सजाते हैं। दौड़ के दौरान 25 लोकगायक भी नाविकों के साथ रहते हैं। इन नावों को आम तौर पर पल्लियोदाम कहते हैं। उल्लेखनीय है कि इस साल ओणम त्योहार की शुरुआत 30 अगस्त को होगी। इस त्योहार के दौरान वल्लमकली बोट रेस के साथ-साथ कई विभिन्न कार्यक्रम भी होते हैं। यह समय न केवल केरल जाने के लिए बल्कि घर लौटने के लिए भी सबसे अच्छा समय माना जाता है।

फोटो साभार: केरल टूरिज्म