भारत की आजादी की लड़ाई में इन 'फिरंगियों' ने भी झंडा बुलंद किया

आजादी के 75वें दिवस पर स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा लेने वाले विदेशी शख्सियतों और उनके योगदान के बारे में जानकारी। इन्होंने भी आजादी की लड़ाई में भारतीयों के साथ मन से भागीदारी की।

भारत की आजादी की लड़ाई में इन 'फिरंगियों' ने भी झंडा बुलंद किया

भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन में देश के लाखों-करोड़ों लोगों ने शिरकत तो की ही, साथ ही कई विदेशी नागरिकों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और भारतवासियों का साथ दिया। उन्‍होंने भी भारतीयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर आजादी की अलख जगाने में अहम भूमिका निभाई। आजादी के 75वींं वर्षगांठ पर ऐसी ही कुछ शख्सियतों और उनके योगदान के बारे में जानकारी।

एनी बेसेंट (1847-1933)

ब्रिटिश सोशलिस्‍ट और थियोसोफिकल सोसायटी की सदस्‍य एनी बेसेंट ने 1898 में वाराणसी में सेंट्रल हिंदू कॉलेज की स्‍थापना में अहम योगदान दिया। वर्ष 1907 में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्‍यक्ष बनीं। इसका अंतरराष्‍ट्रीय हेडक्‍वार्टर अड्यार (चेन्‍नई) में था। भारत में डोमिनियन स्‍टेटस और लोकतंत्र की मांग के साथ 1914-16 के दौरान बाल गंगाधर तिलक के साथ देश में होमरूल आंदोलन चलाया। एनी कांग्रेस की सदस्‍य बनीं और 1917 में इसकी अध्‍यक्ष भी बनीं। होमरूल आंदोलन के दौरान 'कॉमनवील' और 'न्‍यू इंडिया' अखबार भी चलाए। अड्यार में 1933 में उनका निधन हो गया।

सी एफ एंड्रूज (1871-1940)

ब्रिटिश शिक्षाविद् और समाज सुधारक सीएफ एंड्रूज महात्‍मा गांधी के बेहद करीबी थे। महात्‍मा गांधी को दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटने के लिए प्रेरित में अहम भूमिका निभाई। भारतीय स्‍वाधीनता संग्राम में इनके अहम योगदान के चलते महात्‍मा गांधी और दिल्‍ली के सेंट स्‍टीफेंस कॉलेज के छात्रों ने इन्‍हें 'दीनबंधु' की उपाधि से नवाजा।

एलेन ओक्‍टोवियो हयूम (1829-1912)

ए ओ हयूम ब्रिटिश भारत में सिविल सेवक के रूप में तैनात थे। वह पक्षी विज्ञानी और वनस्‍पति शास्‍त्री के रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने 1885 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस की स्‍थापना में अहम योगदान दिया। वह इसके संस्‍थापक सदस्‍यों के रूप में याद किए जाते हैं। बाद में यह पार्टी भारतीय स्‍वतंत्रता आंदोलन की मुख्‍य आवाज बनकर उभरी। इनको भारत में 'पक्षी विज्ञान का पिता' भी कहा जाता है। 1857 के प्रथम स्‍वतंत्रता संग्राम को इटावा के प्रशासक के रूप में बेहद नजदीकी से देखा था। भारतीयों की बदहाली को देखकर लोगों की जीवन दशाओं को सुधारने की दिशा में अहम काम किया।

जॉर्ज यूल (1829-1892)

जॉर्ज यूल इलाहाबाद में 1888 में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के चौथे अध्‍यक्ष बने। इस पद को धारण करने वाले पहले वह गैर-भारतीय थे। कोलकाता के शेरिफ रहने के अलावा वह स्‍कॉट व्‍यवसायी इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्‍यक्ष भी रहे। भारतीय राष्ट्रवाद का पहला या आरंभिक चरण मध्यम दर्जे (नरमदल) का भी कहलाता है। नरमपंथी नेताओं को ब्रिटिश सरकार में पूर्ण विश्वास था और उन्होंने पीपीपी मार्ग यानि विरोध, प्रार्थना और याचिका को अपनाया था। लेकिन नरमपंथी तरीकों से मोहभंग होने के कारण, 1892 के बाद कांग्रेस में चरमपंथ विकसित होने लगा।  लेकिन जॉर्ज ने पीपीपी मार्ग के बजाए अंत तक आत्म-निर्भरता, रचनात्मक कार्य और स्वदेशी पर बल दिया।