हिंदी कवियों के ओजस्वी तराने आजादी के दीवानों में जोश भर देते थे

भारत के स्वतंत्रता के आन्दोलन में हिदी कवियों के ओजस्वी उद्गारों तथा उनसे मिली प्रेरणा ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आजादी के गीत, नगमें और कविताएं गाने वाले कवि अंग्रेजों की प्रताड़ना का शिकार भी हुए। लेकिन जब तक उनकी कलम चली, तब तक वे देशभक्ति को भी अपनी कविताओं में शुमार करते रहे।

हिंदी कवियों के ओजस्वी तराने आजादी के दीवानों में जोश भर देते थे

अकबर इलाहाबादी का शेर है... खींचो न कमानों को न तलवार निकालो/ जब तोप मुक़ाबिल हो तो अख़बार निकालो। यानी लेखनी का महत्व हर दौर में रहा है और आजादी के आंदोलन में भला भारतीय साहित्यकार उस पीड़ा, दुर्दशा, प्रताड़पना से कैसे अछूते रह सकते थे। उस दौर के कवियों ने अपनी लेखनी के माध्यम से उस दौर की पीड़ा तो व्यक्त किया ही है साथ ही युवाओं को उद्वेलित करने और उनमें जोश भरने का काम भी किया। भारत के स्वतंत्रता के आन्दोलन में हिदी कवियों के ओजस्वी उद्गारों तथा उनसे मिली प्रेरणा ने अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भारतेंदु हरिश्चंद्र। 

आधुनिक हिंदी कविता के प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने लिखा....अंगरेज राज सुख साज सजे सब भारी/ पै धन विदेश चलि जात इहै अति ख्वारी। सबके ऊपर टिक्कस की आफत आई/ हा ! हा ! भारत दुर्दशा देखी ना जाई।

मैथिलीशरण गुप्त

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त अपनी राष्ट्रीय रचनाओं के कारण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के समय अत्यंत लोकप्रिय रहे। उनकी भारत-भारती उस दौर में पूरे भारत में लोकप्रिय हो गई थी। अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने उनकी लेखनी से प्रेरणा प्राप्त की। यही वजह है कि अपनी ओजस्वी लेखनी के कारण उन्हें जेल यात्रा भी करनी पड़ी थी। उनकी एक प्रसिद्ध कविता है...जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं/वह हृदय नहीं है पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

माखन लाल चतुर्वेदी 

पंडित माखन लाल चतुर्वेदी की कविताओं ने भी स्वतंत्रता सेनानियों के ह्रदय में राष्ट्र प्रेम की भावना जागृत की | उनकी कविता ‘एक फूल की चाह' इतनी चर्चित हुई और उस जमाने में हर किसी की जुबां पर बस गए। कविता इस प्रकार है....चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं / चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं / चाह नहीं सम्राटों के सर पर हे हरि ! डाला जाऊं / चाह नहीं देवों के सिरपर चढूं, भाग्य पर इठलाऊं / मुझे तोड़ लेना बनमाली उस पथ पर देना तुम फ़ेंक / मातृभूमि पर शीश चढाने जिस पथ जावें वीर अनेक।

जयशंकर प्रसाद 

महाकवि जयशंकर प्रसाद द्वारा प्रस्तुत प्रयाण गीत ने स्वतंत्रता के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा आजादी के दीवानों को दी थी...हिमाद्रि तुंगश्रृंग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारती / स्वयंप्रभा समुंज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती /अमर्त्य वीर पुत्र हो, दृढ प्रतिज्ञा सोच लो/ प्रशस्त पुण्य पंथ है, बढे चलो बढे चलो / अराति सैन्य सिन्धु में, सुबाडवाग्नी से जलो / प्रवीर हो जाई बनो, बढे़ चलो, बढे़ चलो।