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90 साल पहले बनी थी रस मलाई, तब से दुनिया भर में फैल रहा इसके स्वाद का जादू

यह प्रसिद्ध भारतीय मिठाई साल 1932 में अस्तित्व में आई थी जब कोलकाता में बाप-बेटे का एक जोड़ा एक नई मिठाई तैयार करने के लिए प्रयोग कर रहा था। कृष्ण चंद्र दास और उनके सबसे छोटे बेटे शारदा चरण ने अपने स्टोर केसी दास प्राइवेट लिमिटेड में इस मिठाई को सबसे पहले पेश किया था।

रसमलाई (RasMalai) एक बेहद लोकप्रिय और स्वादिष्ट मिठाई है जिसकी उत्पत्ति मूल रूप से भारत के पूर्वी क्षेत्र में हुई थी। इसे बंगाली में रोसोमलाई (Rosso Malai), हिंदी में रस मलाई (Ras Malai) और ओडिया में रसा मलेई (Rasa Malai) कहा जाता है। यह भारत और बांग्लादेशों में बहुत लोकप्रिय है। इसे केसर के स्वाद वाले गाढ़े दूध में ताजे पनीर के गोलों के डुबोकर तैयार किया जाता है और ठंडा-ठंडा पेश किया जाता है।

यह प्रसिद्ध भारतीय मिठाई साल 1932 में अस्तित्व में आई थी जब कोलकाता में बाप-बेटे का एक जोड़ा एक नई मिठाई तैयार करने के लिए प्रयोग कर रहा था। कृष्ण चंद्र दास और उनके सबसे छोटे बेटे शारदा चरण ने अपने स्टोर केसी दास प्राइवेट लिमिटेड में इस मिठाई को सबसे पहले पेश किया था। यह स्टोर बागबाजार में स्थित है। इसका नाम दो हिंदी शब्दों को मिलाकर बनाया गया है जिन दोनों का लुत्फ इसमें मिलता है।

इसे खाने का तरीका यह है कि पहले ठंडे दूध का स्वाद लिया जाए और फिर रस मलाई का एक टुकड़ा खाया जाए। 

इसे खाने का तरीका यह है कि पहले ठंडे दूध का स्वाद लिया जाए और फिर रस मलाई का एक टुकड़ा खाया जाए। आप इसे चम्मच से खा सकते हैं या फिर सीधे कटोरी से भी खा सकते हैं। रस मलाई खाने का कोई सही या गलत नियम नहीं है। सिवाय एक के कि इसे ठंडा ही पेश किया जाए। इसके अलावा कोई भी केवल एक रस मलाई खाकर रुक नहीं सकता। खास कर तब जब गर्मी बहुत तेज हो और रस मलाई एकदम ठंडी।

उल्लेखनीय है कि जब फ्रिज नहीं हुआ करते थे तब इस मिठाई को ठंडा रखने के लिए कुल्हड़ या मिट्टी के बर्तनों में रखा जाता था। अब कई वर्षों बाद रस मलाई को कुल्हड़ में पेश करना कई रेस्तरां में ट्रेंड बन गया है और इसे लोग पसंद भी करते हैं। जैसे-जैसे इसकी लोकप्रियता बढ़ी है इसमें लोगों ने एक्सपेरिमेंट भी किया है। अब यह मिठाई कई फ्लेवर में भी उपलब्ध है। साथ ही समय के साथ इसके आकार में भी बदलाव आया है।

भारतीय फूड साइंटिस्ट और हिस्टोरियन केटी अचाया की किताब 'अ हिस्टोरिकल कंपेनियन' में रस मलाई का उल्लेख मिलता है। अचाया की इस किताब में इस मिठाई की खोज के बारे में विस्तार से बताया गया है। इसके अनुसार साल 1868 में 22 साल के नोबिन चंद्र दास ने रसगुल्ला बनाया था। इसके 50 साल बाद कृष्ण चंद्र दास ने रसगुल्ले की इस रेसिपी का इस्तेमाल दूध से बनी रस मलाई का निर्माण करने में किया था।

कृष्ण चंद्र दास के परपोते धीमान दास कहते हैं कि रसगुल्ला एक आविष्कार था और रस मलाई एक इनोवेशन क्योंकि इसका निर्माण रसगुल्ले से ही हुआ था। मेरे परदादा के पांच बेटे थे और अपने सबसे छोटे बेटे के शारदा चरण साथ मिलकर उन्होंने यह मिठाई बनाई थी। शारदा राजा बाजार साइंस कॉलेज में प्रख्यात नोबेल विजेता फिजिसिस्ट चंद्रशेखर वेंकट रमण के साथ फिजिक्स डिपार्टमेंट में रिसर्च असिस्टेंट थे।

धीमान दास बताते हैं कि अपने वैज्ञानिक एप्लीकेशंस का उपयोग करके रिवर्स ऑस्मोसिस प्रक्रिया के जरिए शारदा ने रस मलाई बनाई थी। उसी साल एक क्षेत्रीय भाषा के समाचार पत्र में रस मलाई के इनोवेशन का एक विज्ञापन भी प्रकाशित हुआ था। अब समय के साथ इस मिठाई ने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अपने स्वाद का जादू फैलाया है और पूरी दुनिया के लोग चाव से इस बेहद स्वादिष्ट मिठाई का स्वाद लेने को आतुर रहते हैं।

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